ये रहे वो सवाल, सोचने के लिए, जब चर्चा के सवाल आपसे निपट चुके हों।
क्या चर्चा के सवालों ने आपका मन बदला? अगर हां, तो पुराना मन गया कहां?
अगर किसी चर्चा के लिए कई सवालों को बारी-बारी आना पड़े, तो क्या एक अकेला सवाल भी अपने-आप में एक चर्चा नहीं माना जाना चाहिए, जिसमें बस एक ही शामिल हो?
इनके जवाब ढूंढ कौन रहा है? क्या किसी सवाल का एक से ज़्यादा सही जवाब हो सकता है? क्या सबसे ऊंची आवाज़ वाला जवाब ही सबसे मान्य होता है?
हमारे नज़रिए में थोड़ा और बहुलतावाद लाने से कैसी उलझनें पैदा होती हैं? "सबसे आसान" जवाब हमेशा सबसे सही क्यों नहीं होता?
चर्चा के सवाल लिखता कौन है? क्या इसमें कोई बिना तनख़्वाह वाले इंटर्न शामिल हैं? अगर हां, तो क्यों? अगर नहीं, तो क्या मैं एक लिख सकता हूं?
अगर ये चर्चा के सवालों की चर्चा के सवाल थे, तो चर्चा के सवालों की चर्चा के सवालों की चर्चा के सवाल कहां हैं?
भूमिका कौन पढ़ रहा है?